हरितालिका व्रतक मैथिली कथा

मैथिली मे कथा

मन्दारमालाकुलितालकायै कपालमालाङ्कितशेखराय।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।

एक दिस आकक माला गूथल केश छनि आ दोसर दिस मूडीक हड्डीके माला माथ पर धारण केने छथि। एक दिस सुन्दर पटोर पहिरने आ दोसर दिस विना कपडा पहिरने छथि। एहन गौरी कें प्रणाम आ महादेव कें प्रणाम।

कैलासक रमनगर चोटी पर गौरी महादेवसँ पुछलथिन- हे महादेव सभक लेल जे धर्म अछि जकर फल विना कोनो विशेष प्रयास के भेटि जाइत छै आ जे नुकाओल अछि से, जँ अहाँ प्रसन्न छी तँ ठीक ठीक हमरा कहू। अहाँ तँ संसारक स्वामी छी आ अहाँ जन्म, स्थिति आ विनाश सँ ऊपर छी से कोन दान अथवा कोन तपस्यासँ हमरा अहाँ स्वामीक रूपमे भेटलहुँ।

महादेव कहलनि- हे प्रिये हम अहाँ कें ओ उत्तम व्रत सुनबै छी। ई हमर नीक व्रत छी, जकरा जतनसँ नुकाए रखबाक चाही, से हम सभटा कहै छी। जेना तारा सभक बीच चन्द्रमा छथि, ग्रह सभक बीच सूर्य छथि, वर्ण सभमे ब्राह्मण होइत छथि, देवता सभमे विष्णु छथि, नदी सभमे गंगा छथि, पुरातन ग्रन्थ सभमे महाभारत अछि, वेद सभमे सामवेद अछि आ इन्द्रिय सभमे मन अछि तहिना पाबनि सभमे ई पाबनि अछि। जेना आगमक ग्रन्थ सभमे कहल गेल अछि जे ई पुराणक कथा वेदक मुख्य वस्तु थीक। प्राचीन कालमे जे कथा कहल गेल अछि, तकरा अहाँ श्रद्धासँ सुनू।

भादवक मास शुक्लपक्षमे तृतीया तिथि कें जँ हस्त नक्षत्र रहय तँ ओहि दिन पाबनि केलासँ सभ पाप मेटा जाइत छैक।

हे देवी, अहाँ तँ बिना बुझनहिं ई व्रत कएने रही। ओ सभटा हम सुनबैत छी जेना हिमालय पर हम देखने रही।

पार्वती कहलनि- हे महादेव, हम पूर्वकालमे ई उत्तम व्रत केना कएने रही से सभटा अहाँक मुँहसँ सुनए चाहैत छी।

महादेव कहलनि- हे देवी, पहाड सभ मे उत्तम पहाड हिमालय अछि जे विभिन्न प्रकारक गाछ-वृक्षसँ रमनगर लगैए। बहुत रास चोटी सभ सँ ओ शोभित अछि। एहि पहाड पर गन्धर्व सभ संग देवता, सिद्ध, चारण, यक्ष आ गीत गबैत गन्धर्व सभ बुलैत रहैत छथि। स्फटिक आ सोना सनक चोटी सभ जाहि पर हीरा आ लहसुनिया पाथर सँ सजल अछि ओ त्रिकूट जकाँ आकाशमे वर्फक ढेरी जकाँ शोबित अछि।

बर्फसँ भर रमनगर चोटी पर जतए गंगाक धारा खसबाक कारणें सुन्दर लगैत छल। ओतए अप्सरा सभक झुंडक झुंड नाच सँ नाच सँ जे हिमालय सुन्दर लगै छल ओहि ठाम अहाँ जहिया बच्चे रही तहिया पैघ तपस्या केने रही। अहाँ एक हजार वर्ष मूडी लटकाए केवल धुँआ पीबैत रहलहुँ, तकर बाद एक लाख वर्ष धरि पाकल पात खाए रहलहुँ तकर बाद तँ ओहो छोडि देलहुँ। अहाँक ई कष्ट देखि अहाँक पिता चिन्ता सँ दुःखी भेलाह। हुनका चन्ता भएलनि जे ई कन्या किनका देल जाए। ओ ई बात सोचिते रहथि की मुनि नारद ओतए पहुँचलाह। अहाँक पिता हिमालय अर्घ्य आदिसँ हुनक पूजा कए पुछलथिन।

हिमालय पुछलथिन- हे मुनिश्रेष्ठ आइ कोन कारणें अएलहुँ से कहू।

नारद बजलाह- हे देव, जेना कि हमरा आदेश कएल गेल अछि, हम विष्णुक द्वारा पठाओल गेल छी। योग्य कन्या योग्ये व्यक्ति कें देबाक चाही। एखनि ब्रह्मा, विष्णु आ महेश आदि देवता लोकनिमे वासुदेवक बराबरीक केओ नै छथि तें अहाँ चिन्ता नै करू, ई कन्यारत्न हमरा दए दिय, सैह समयक अनुकूल होएत।

हिमालय बजलाह- वासुदेवक समान देवता जँ कन्या मँगैत छथि आ अहाँक आगमन सेहो महत्त्व रखैत अछि तँ हमरा कन्या दए देबाक चाही।

ई सुनि कए नारद झट दए भगवान् विष्णु लग पहुचलाह। ओतए शंख, चक्र आ गदा धारण कएने भगवान् विष्णुक लग जाए कल जोडि नारद मुनि कहलनि- हे देव, बडका काज भए गेल आब वियाहक तैयारी करू। हिमालय हमरा जे कहलनि से सभटा सुनबैत छी- ई कन्या हम गरुडध्वज विष्णु कें दए देलहुँ।

नारदक ई गप्प सुनि पार्वती दुःखी भए गेलीह। हुनका दुःखसँ व्याकुल देखि कए रातिमे सखी पुछलनि।

सखी पुछलनि- हे देवि पार्वती अहाँ दुःखी किएक छी से ठीक ठीक कहू। कल्याणकारी उपायसँ हम अहाँक कल्याणक काज करब। एहि मे सन्देह नै करू।

पार्वती कहलनि- हम जे सोचने रही ओकर उनटे हमर पिता कए देलनि। तखनि आब हम ई निश्चय ई देह त्यागि देब।।28।।

पार्वतीक ई गप्प सूनि सखी बजलीह।

सखी कहलनि- अहाँके पिताकें जाहि घनघोर जंगलक पता नै छनि ओतए चल जाउ। एहि प्रकारें हुनका मना कए तुरते घनघोर जेगल चलि गेलीह।

एम्हर पिता हिमालय हुनका घरे-घरे ताकए लगलाह। हमर बेटी कें के लए गेल। की देवता, की दानव अथवा की राक्षस लए गेल। हम जे पहिने प्रतिज्ञा केने छी से आब विष्णु कें की देवनि। हे गैरी, एहि चिन्तासँ ओ मूर्छित भए धरती पर खसि पडलाह। लोक सभ हा हा कए हुनका दिस दौडल- अहाँ कें किएक मूर्छा भए गेल से नीक जकाँ कहू।

हिमालय बजलाह- के दुष्ट हमर दुलारू बेटी कें हरि कए लए गेल? की ओकरा कालसर्प डँसि लेलकै? की ओकरा सिंह अथवा बाघ मारि देलकै? नै जानि हमर बेटी कतए चलि गेल? अथवा के दुष्ट ओकरा हरि लेलकै?

एम्हर तँ अहाँ डेराओन ओ घरघोर जंगलमे पहुँचि गेल रही, जतए सिंह, बाघ, साँप, गिदड, कुकुर आ हिरण सभ भरल छल।

ओतहि एकटा रमनगर नदी देखि कए ओकर कछेर मे अहाँ महादेकक व्रत में लीन रही आ अहाँक संग सखी सभ बैतल रहथि।

अहाँ बालू सँ सतीक संग हमर मूर्ति बनाए नेन रही आ भाद्र शुक्ल तृतीया कें हस्त नक्षत्रक संयोग भेलापर  गीत-नाद आ बाजाक संग राति मे जगरना कएने रही। एहि व्रतक प्रभावसँ हमर आसन डोलि गेल।

हे देवि हम ओतहि पहुँचि गेलहुँ जतए अहाँ सखी सभक संग रही। हम कहलहुँ- हम अहाँ पर प्रसन्न छी, वर माँगू। अहाँ कहलहुँ- हे देव जँ अहाँ प्रसन्न छी तँ हमर पति महादेव होथि। एहिना होएत- ई कहि हम कैलास पहाड पर आबि गेलहुँ।

तखनि भोर भेला पर सभ किछु छोडि कए वनमे देखल गाछ-वृक्ष द्वारा जे अहाँ कें देल गेल सैह पारणा केलहुँ। संगहि अहाँ ओतए अपना सखीक संग सुतल रही। तखनि हिमालय सेहो घनघोर जंगल मे ओहि स्थान पर पहुंचि गेलाह। चारूकात देखलनि तँ विना खेने-पीने नदी कातमे दू टा कन्याकें सूतल देखलनि। ओ हुनका उठाकए कोरामे लए हुनकर हाथ पकडि लेलनि आ पुछलनि जे बाघ, सिंह हाथी आदि सँ भरल एहि जंगलमे अहाँ किए एलहुँ?

पार्वती कहलथिन- हे तात, हमरा पता चलल जे अहाँ हमरा विष्णुकें दए रहल छी, जे अहाँ हमर सोचल बातसँ भिन्न बात कएने रही तें हम वन आबि गेलहुँ। तें अहाँ हमरा महादेव कें दए सकैत छी, अनका नहिं।

एहिना होएत ई कहि कए हिमालय अहाँ कें घर अनलनि। ततर बाद अहाँक पिताक द्वारा हमर विवाहक तैयारी आरम्भ भेल। ओही व्रतक प्रभावसँ अहाँकें ई सौभाग्य भेटल। एहि दिनक बादसँ ई व्रत ककरहु नै बुझए देल गेलै। एहि व्रतराजक नाम किए पड़ल से सुनू- अहाँ सखी सभक द्वारा एहि दिन हरण कएल गेलहुँ तें एकरा हरितालिका कहल गेल।

पार्वती पुछलथिन- हे देव, नाम तँ कहलहुँ आब हमरा सोझाँमे व्रतक विधान सेहो कहू। ई केलासँ कोन पुण्य होइत छै, की फल छै, आ कोन विधान सँ ई पाबनि कएल जाइत छै।

महादेव कहलनि- हे देवि, सुनू, हम कहैत छी। महिलालोकनिक ई उत्तम व्रत थीक। जँ सौभाग्य चाहैत छी तँ ई करबाक विशेष रूपसँ करबाक चाही। केराक थम्हसँ तोरण आदि बनएबाक चाही। एहि घरक भूमिकें चन्दन आदि सुगन्धित वस्तु सँ नीपि दी। शङ्ख, धुथहू, मिरदंग आ आनो-आनो बाजा सभसँ अनेक प्रकारक मंगलक ध्वनि हमर एहि घरमे करबाक चाही। ओतए पार्वतीक संग हमर स्थापना करबाक चाही। ओहि दिन व्रत कए फूल आदि सँ पूजा करबाक चाही आ राति मे जगरना करी। नारिकेर, संतोला आदि विभिन्न फल, जे ओहि समय आ ओहि स्थान पर फरैत अछि ओहि सभ सँ आ नव-नव फूलसँ, धूप, दीप, चानन सँ एहि मन्त्र सँ पूजा करी।

शिवायै शिवरूपायै मङ्गलायै महेश्वरि। 
शिवे सर्वार्थदे देवि शिवरूपे नमोस्तु ते।।56।।
शिवरूपे नमस्तुभ्यं शिवायै सततं नमः।
नमस्ते शिवरूपिण्यै जगद्धात्र्यै नमो नमः।।57।।
संसारावृत्तिविच्छेदे पाहि मां सिंहवाहिनि।
मयाद्य येन कामेन पूजितासि महेश्वरि।।58।।
राज्यं मे देहि सौभाग्यं प्रसन्ना भव पार्वति।

हे महेश्वरि, शिवक शक्ति शिवा कें प्रणाम। शिवस्वरूप देवी कें प्रणाम। मङ्गला कें प्रणाम। हे शिवे, हे सभ सिद्धि देनिहारि, अहाँ जे शिवक स्वरूपा देवी थी, तनिका प्रणाम। हे शिवस्वरूप देवी, अहाँकें प्रणाम। शिवा कें सभखन प्रणाम। शिवस्वरूप देवी कें प्रणाम। संसारक पालन करएवाली देवी जगद्धात्री कें प्रणाम। हे सिंहवाहिनी देवी, अहाँ संसारक चक्र कें काटि मोक्ष दैत छियैक, अहाँ हमर रक्षा करू। जाहि कामनासँ हम अहाँक पूजा केलहुँ से हमरा हुअए। हमरा राज्य दियऽ। हमरा सौभाग्य दियऽ। हमरा पर प्रसन्न होउ।

एकर बाद ब्राह्मण कें कपडा, गाय आ सोना दान करबाक चाही। पतिक संग बैसि, कथा सुनि कए चानन फूल आदि लए दानक संकल्प करी।

हे महादेवी, जे महिलालोकनि ई श्रेष्ठ व्रत विधानपूर्वक करैत छथि हुनका भाग-सोहाग आ राज्य भेटैत छनि। हुनक पापक नाश होइत अछि।

तृतीया तिथि कें जे लोभसँ भोजन करैत छथि ओ सात जन्म बाँझ होइत छथि  फेर-फेर विधवा होइत छथि। हुनका दरिद्रता, पुत्रक शोक घेरने रहैत छनि। ओ कठोर होइत छथि आ अनेक प्रकारक दुःख भोगैत छथि। जे व्रत कए ई पावनि नै करैत छथि ओ घोर नरक मे जाइत छथि।

जे ई व्रत करैत छथि से हजारो अश्वमेध यज्ञ आ सैकडो वाजपेययतज्ञक फल कथे चा सुनलासँ ओही कालमे पाबि जाइत छथि।

हे देवी, अहाँक सोझाँमे ई व्रत कहलहुँ। आब एकर सौपबाक विधान कहब, जेना हमर आगम-ग्रन्थ (शिव-सम्बन्धी आगम ग्रन्थ) सभमे कहल गेल अछि।

हे देवी, अहाँक सोझाँमे ई व्रत कहलहुँ। आब एकर सौपबाक विधान कहब, जेना हमर आगम-ग्रन्थ (शिव-सम्बन्धी आगम ग्रन्थ) सभमे कहल गेल अछि। सभ प्रकारक कामनाक सिद्धि लेल गाय, जमीन, सोना आदि आ वस्त्र आदि दान कए उद्यापन-याग करबाक चाही।

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