सोतिक विवाहमे साँकरक डाला

A practical guide to marriage procedure in Shrotriyas of Mithila 01

सोतिमे विवाहक प्रक्रिया, भाग 1

(देखल, कएल आ भोगल यथार्थ)

मिथिलामे जे लोकनि पारम्परिक सोति, श्रोत्रिय छथि हुनकालोकनिमे विवाहक प्रक्रिया किछु भिन्न छनि, जे श्रोत्रियेतर मैथिल ब्राह्मण सँ मिलैत नै अछि आ इहो एकटा कारण अछि जे सोति वैवाहिक मामलामे अपनाकें रिजर्व राखए चाहैत छथि, अपनहि समूहमे सम्बन्ध स्थापित करबाक लेल आयास करैत छथि।

अधिकारमाला

जिनका कन्यादान करबाक रहैत छनि ओ सभसँ पहिने पंजीकारसँ सम्पर्क कए “अधिकारमाला” बनबबैत छथि। एखनि ककरौड़ गामक पं. शक्तिनन्दन झा, कोइलखाहा गामक पं. विभूतिनाथ झा ई दू पंजीकार प्रसिद्ध छथि। सरिसब गामक श्री योगनाथ झा सॉफ्टवेयर पर काज करैत छथि आ सौराठ गामक पं. कालिकादत्त झा बेसी आग्रह कएला पर सोतिक अधिकारमाला आदि बनाए दैत छथि। जँ किनको दू टा बेटी छथिन्ह तँ एके अधिकारमालासँ दोसरोक विवाह भए जाइत छनि।

“अधिकारमाला” एकटा सूची होइत अछि जाहिमे ओहि कन्याक लेल सोतिपुराक भीतर कोनो-कोन परिवारमे शास्त्रीय दृष्टिसँ अस्वजन होएबाक कारणें वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कएल जा सकैत अछि तकर उल्लेख रहैत अछि। एहिमे पंजीकार ई गणना करैत छथि जे मातृकुल सँ पाँचम आ पितृकुलसँ छठम ठाम जे वर होइत छथिन, से त्यागि कए जे शेष बचैत छनि, जतए विवाह कएलासँ रक्तसम्बन्धक कोनो गुंजाइस नै रहैत अछि, ओकर सूची दैत छथि। एहूमे पंजीकारक स्पष्ट निर्देश रहैत अछि जे विवाह स्थिर करबासँ पहिने फेर मिलान कए ली। एहि सूचीमे 200-225 नाम रहैत अछि। एतए वरक पिताक नाम, मातामहक नाम आ गामक नाम ई तीन टा सूचना रहैत अछि। कन्यागतकें एही सूचीकें देखि कोनो एक परिवारमे सम्बन्ध स्थापित करबाक रहैत छनि। व्यावहारिक रूपसँ एहि सूचीमे 100 परिवार एहन होइत छथि, जनिक वरक वयस कन्यासँ कम्मे रहैत अछि। ओकर अतिरिक्त 50 टा परिवार एहन रहैत अछि, जतय वरक विवाह भए चुकल अछि। तखनि बचि जाइत अछि लगभग 50 टा परिवार।

कथा उपस्थिति

कन्यागत एहि पचासो परिवारक सूची गामक हिसाबसँ बनबैत छथि आ अपन सर-कुटुम्बक सहायतासँ वरक सम्बन्धमे पता लगबैत छथि। अधिकांश परिस्थितिमे बहुतो गोटे एहन रहैत छथि जे दूनू पक्षसँ सम्बन्धित रहैत छथि। ओ लोकनि कन्यागत आ वराइतक बीच सम्पर्क कराएब अपन धर्म बुझैत अछि। एखनहुँ सोतिमे ई मान्यता आछि जे किनकहुँ प्रयाससँ जँ सम्बन्ध स्थिर भए जाइत छैक तँ हुनका एकर धर्म होएतनि। एहने सम्बन्धिक माध्यमसँ बराइतसँ सम्पर्क कए कन्यागत  “कथा उपस्थित” करैत छथि।

जँ वराइत गाममे रहैत छथि, तखनि तँ कोनो बात नै, जँ बाहर रहैत छथि तँ हुनकासँ ई पुछल जाइत अछि जे कतए उपस्थित होइ। आदर्श अवधारणा अछि जे जतय हुनक गोसाउनि छथिन, माने गाममे, ओतहि औपचारिक रूपसँ कथा उपस्थित कएल जाए। विशेष परिस्थितिमे जँ बराइत कहैत छथिन जे हम जतय रहैत छी, ओतहि आबथि, तखनि कन्यागत पूर्व सूचना दए नीक दिनमे हुनका ओतए पहिल बेर उपस्थित होइत छथि। एहि पहिल उपस्थितिमे कन्याक पिता सामान्यतः स्वयं जएबासँ बचैत छथि। जँ हुनका लग कोनो विकल्प छनि तँ आने केओ निकट सम्बन्धी जाइत छथिन्ह। पहिल दिन औपचारिकता मात्र होइत अछि। वराइत एतबे मात्र कहैत छथिन जे हम कथा उपस्थिति स्वीकार कएल, विचार कए हम सूचना देब। वराइत फल, मेवा आदिसँ कन्यागतक स्वागत करैत छथिन्ह। कोनो प्रकारक नमकीन वस्तुक व्यवहार नै होइत अछि। आब वराइत सेहो बेसी व्यावहारिक भए गेलाह अछि। ओहो जनैत छथि जे जँ सोतिएमे बेटाक विवाह कराएब तँ हमरहु गनले-चुनल घर अछि। तें ओहो किछुए दिनमे बिचारि कोनो माध्यमसँ संवाद दए दैत छथिन्ह, जे हमरा ई कथा स्वीकार अछि। जँ स्वीकार नै रहैत छनि तँ सेहो संकेत कराए दैत छथिन्ह। कन्यागत कें बेसी दिन दौड़बाक काज नै होइत छनि। आब कन्यागत कें बेसी दिन झुलेबाक प्रचलन घटि गेल अछि।

हथधरी आ राशि-नक्षत्र देनाइ

जँ कथा स्वीकार रहैत छनि तँ वराइत “राशि-नक्षत्र देबाक” तिथि निर्धारित करैत छथि। किछु वर्ष पहिने धरि एकटा आर प्रक्रिया होइत छल- “हथधरी”। ओहिमे कन्यागत बराइतक ओतए अबैत छलाह। बराइत पाग पहिरि अपन दरबज्जा पर विधिवत् ठाढ भए कन्यागतक हाथ पकड़ैत छलथिन्ह। यैह बुझल जाइत छल जे विवाह ठीक भए गेल। आब जँ वराइत आ कन्यागत दूनू बाहर रहैत छथि तँ ई विधि समाप्तप्राय अछि। आब सोझे “राशि-नक्षत्र देबाक” दिन “हथधरी” सेहो भए जाइत अछि।

वराइत एकटा कागज पर अपन वरक जन्मराशि आ जन्म-नक्षत्र लीखि एकटा डालीमे राखि अपन घरमे गोसाउनिक सीर पर रखैत छथि। ओतए गोसाउनिक विशेष पूजा होइत अछि आ तखनि ओ कागज गोसाउनिक सीरसँ आनि कन्याक पिताक हाथमे दैत छथिन्ह। वराइत पूब मुँहे आ कन्यागत पश्चिम मुँहें ठाढ़ होइत छथि। ओही कालमे हथधरी आ राशि-नक्षत्र देबाक विधि सम्पन्न होइत अछि। वराइत अपना ओतए आएल कन्यागत सभक फल, मेबा आदिसँ स्वागत करैत छथि। वराइत ई संकेत कए दैत छथिन्ह जे अमुक मासमे विवाहक दिन तकाबी। एकरा कथाक स्थिरता बुझल जाइत अछि। एकर बादे कन्यागत सार्वजनिक रूपसँ ई कहबाक अधिकारी होइत छथि जे हमर कन्याक विवाह फल्लाँ घरमे स्थिर भए गेल।

कन्यागत ओ कागज लए सोझे अपन घर पर अबैत छथि। ता धरि कागज खोलि देखबाक मान्यता नै अछि। ओ कागज लए सोझे अपन गोसाउनिक सीर जाइत छथि आ ओतए एकटा डाली पर राखि भगवतीक आराधना करैत छथि।

दिन तकाएब

एकर बाद कन्यागत अपन कन्याक राशि-नक्षत्रक संग वरक राशि-नक्षत्र लए ज्योतिषीसँ विवाहक दू, तीन टा दिन तकबैत छथि। एहिमे प्रत्येक विवाहक दिनक अनुरूप 1. सिद्धान्तक दिन, 2. विवाहक दिन, 3. कन्यादानक समय, 4. विदाक समय –एतबा रहैत अछि। कन्या अथवा वर दूनूक राशि-नक्षत्रक दृष्टिसँ मिलान कए वर्जित चन्द्रमा आ ताराक हिसाबसँ ज्योतिषी दिन तकैत छथि।

ज्योतिषीक हाथक लिखल ओ कागज लए कन्यागत पुनः बराइत ओतए जाइत छथि। बराइत अपनहुँ ज्योतिषीसँ दिनक संपुष्टि करबैत छथि आ दूनू पक्ष सभ प्रकारक विमर्श कए विवाहक एकटा दिन निर्धारित करैत छथि। ओहि दिनक दृष्टिसँ चारि-पाँच दिन पहिने जे सिद्धान्तक दिन रहैत अछि से निर्धारित भए जाइत अछि।

सिद्धान्तक प्रक्रिया-

आब कन्यागत फेर पंजीकारसँ सम्पर्क करैत छथि आ हुनका सिद्धान्तक दिन कहि दैत छथिन। किछु दशक पूर्व धरि व्यवस्था छल जे वराइत आ कन्यागतक गामक बीच कोनो सार्वजनिक स्थान जेना कोनो देवी मन्दिर, (शिवमन्दिर वर्जित) विद्यालय आदि रहैत छलैक तँ ओ स्थान सिद्धान्तक लेल निर्धारित होइत छल। आब जखनि विवाहक संख्या बढि गेल छैक तँ सोतिक उपर्युक्त पंजीकारसभ ठाम-ठाम स्थान निर्धारित केने छथि। जेना पं. श्री शक्तिनंदन झाक द्वारा निर्धारित प्रसिद्ध स्थान सभ अछि- सरिसबक लक्ष्मीवती महाविद्यालयक परिसर, मधुबनीमे काली मन्दिर, दरभंगामे माधवेश्वर परिसर आदि। ओतए सिद्धान्तक दिन सभ वराइत आ कन्यागत जुटैत छथि आ बेरा-बेरी सिद्धान्त होइत अछि।

सिद्धान्तमे कन्यापक्ष पश्चिम मुँहें आ वरपक्ष पूब मुँहें पंक्तिमे बैसैत छथि। पहिने जखनि चतरल दूबि रहैत छल तँ दूबि पर बैसबाक प्रचलन छल। आब दूबिक अभावमे माँटि पर गंदा लगबाक भय सँ अधिकांश सिद्धान्तमे दरी बिछा देल जाइत अछि, मुदा अलग-अलग बिछाओल जाइत अछि। पंजीकार दूनूक बीचमे सभसँ दक्षिण उत्तर मुँहें बैसैत छथि आ दूनू पक्षक उतेढ़ पढि सुनबैत छथिन्ह आ अन्तमे घोषणा करैत छथि जे एहि कन्या आ वर कें कोनो रक्तसम्बन्ध नहिं, तें ई विवाह भए सकैत अछि।

एकर बाद कन्याक दिससँ कन्याक पिता अथवा केओ वृद्ध व्यक्ति ऊठि ठाढ़ होइत छथि आ हाथ जोड़ि कहैत छथिन्ह जे “हम फल्लाँ व्यक्तिक कन्याक दिससँ कन्यकोपस्थिति करैत छी।” एतए गाम, मूल आ गोत्रक उच्चारण कएल जाइत अछि। तखनि वर पक्षसँ ओही प्रकारक व्यक्ति ऊठि हुनक हाथ पकड़ि कहैत छथिन्ह- “हम स्वीकार करैत छी।“ वराइतक दिसँ एकटा पीयर साड़ी आएल रहैत अछि जे कन्यागत कें सौपि देल जाइत अछि। कन्यागत पनबट्टीमे पान अनने रहैत छथि से वराइत कें अर्पित करैत छथिन्ह।

पंजीकारक विदाई- कन्यागत पंजीकारकें ओहि स्थान धरि यातायातक व्यवस्था कएने रहैत छथि अथवा हुनका नगदी देने रहैत छथिन्ह। सिद्धान्तक बाद जँ कन्यागत 501 रुपया दैत छथिन्ह तँ वराइतक नैतिक जिम्मेदारी होइत छनि जे ओ दूना लगाए देथि। पंजीकार अपन पंजीमे एहि सम्बन्धकें लीखि लैत छथि आ पंजी अद्यतन करैत छथि।

एकर बाद आब पैकेट, चाह, पान आदिक व्यवस्था सेहो होमए लागल अछि। मुदा पैकेटमे नमकीन नै रहैत छैक। फल मेबा, मधुर यैह सभ रहैत छैक, एकर नाम थीक बिगजी- (भेषजी फल-मूल आदि औषधीय पदार्थ) एही दिन दूनू पक्षक लोक बैसि बरियातीक संख्या पर विचार करैत छथि। एहूमे वराइत कोनो जोर नै दैत छथिन्ह। कन्यागत जतबे कहैत छथिन्ह ओतबे मानल जाइत अछि। दूनू पक्षक सामान्य लोक परस्पर सामंजस्य बैसेबामे पूर्ण सहयोग करैत छथि।

खण्डवलाकुलक सदस्यमे विशेष- जँ दूनू पक्ष सोति रहैत छथि तँ उपर देल गेल विवरणक अनुसार सभ काज सम्पन्न होइत अछि। मुदा जँ कोनो पक्ष बाबू साहेब माने खण्डवला कुलक सदस्य छथि तँ सिद्धान्तक प्रक्रिया बदलि जाइत अछि। आइयो खण्डवला कुलक लोक जे अपन गरिमा बचाए रखने छथि, ओ सोति कें पाल्य बुझैत छथिन्ह, तें ओ कन्यागत रहथु अथवा वराइत सिद्धान्त हुनके घर पर होइत अछि। एहि स्थितिमे बाबू साहेब अपन खर्चसँ सभटा व्यवस्था करैत छथि। दोसर पक्ष कमे संख्यामे हुनक घर पर पहुँचैत छथिन्ह आ सिद्धान्तक बाद धोती पहिराए हुनका भोजन कराओल जाइत छनि। ओना आब ई प्रचलन घटल जा रहल अछि। सामान्य सोति जकाँ सिद्धान्त होमए लागल अछि।

दूनू परिस्थितिमे वराइत सिद्धान्तक कालमे जे साड़ी देने रहैत छथिन्ह से साड़ी ओही दिन कन्या कें पहिराओल जाइत अछि। ई सिद्धान्तक साड़ी कहबैत छैक।

अगिला भागमे विवाह दिनक विवरण देल जाएत। एहि बीच कन्यागत आ वराइतक बीच औपचारिक रूपसँ कोनो सम्पर्क नहिं होएत।

इति प्रथम भाग समाप्त