अयोध्या में जन्मभूमि मन्दिर में मूर्ति कैसी थी?

यह एक प्रामाणिक उल्लेख मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि जन्मभूमि पर प्राचीन काल में माता कौसल्या की गोद में बैठे श्रीराम की मूर्ति वहाँ थी। आज भी यदि वैसी ही मूर्तियाँ लगे तो श्रीराम जन्मभूमि अपनी खोयी हुई गरिमा को पा जाये।

मैथिली लोकगीतों में नारी

जनक-याज्ञवल्क्य की धरती मिथिला एक ओर यजुर्वेद एवं शतपथ-ब्राह्मण की वैदिक परम्परा की भूमि रही है तो दूसरी ओर आगम-परम्परा में शक्ति-पूजन के लिए विख्यात रही है। यहाँ वैदिक परम्परा … Read More

सीताजी के वरदान से होती है हनुमानजी की पूजा

श्रीराम के बगल में बैठी हुई सीताजी ने इससे आगे का आशीर्वाद दे डाला कि हनुमानजी देवता के रूप में पूजित होंगे। जहाँ हनुमानजी का स्मरण किया जायेगा, वहाँ पेड़ों पर अमृत के समान फल लगेंगे, स्वच्छ जल का प्रवाह बहता रहेगा।

वाल्मीकि रामायण का आलोचनात्मक संस्करण

भण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इंस्टीच्यूट, पूना से वाल्मीकीय रामायण का आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित हुआ जो पाठ भेदों को समझने के लिए स्थानीय प्रक्षेपों को, अपपाठों को जानने के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य है।

वाल्मीकि रामायण का सबसे पुराना प्रकाशन

विलियम कैरी एसियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल के सदस्य थे। वाल्मीकि रामायण का प्रकाशन गद्यानुवाद के साथ किया, जो 3 खण्डों में सेरामपुर प्रेस से 1806-07 में प्रकाशित हुआ।

विलियम वॉन श्लेगल द्वारा सम्पादित वाल्मीकि रामायण का मिश्रित पाठ

1846 ई. में विलियम वॉन श्लेगल ने वाल्मीकि रामायण के दो काण्डों बालकाण्ड एवं अयोध्याकाण्ड का सम्पादन लैटिन अनुवाद के साथ किया।

वाल्मीकि रामायण का पश्चिम-उत्तर भारत का पाठ

पश्चिमोत्तर पाठ के मूल यहाँ संकलित हैं। इस संस्करण का भी हिन्दी अनुवाद नहीं हुआ है। काश्मीर का मुख्य रूप से पाठ होने के कारण यह अपनी विशेषता तथा प्राचीनता लिये हुए है।

वाल्मीकि रामायण का पूर्वोत्तर भारत का पाठ

पूर्वोत्तर का पाठ नेपाल, मिथिला, और बंगाल में प्रचलित हैं। इन तीनों का पाठ एक है। जहाँ कहीं भी थोड़ा बहुत पाठान्तर दिखायी देता है, उसमें भी अर्थ का अन्तर नहीं है। यह सबसे महत्त्वपूर्ण पाठ है।

Maithili story in Mithilakshar 01

आइ मिथिलाक्षर बहुत गोटे सीखि रहल छथि। हुनका पढबाक लेल समग्री चाही, नहीं तँ सिखल सभटा बिसरि जएताह। एहि स्थिति कें देखैत किछु सामग्री मिथिलाक्षरमे प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल अछि। ओही शृंखलाक ई पहिल प्रकाशन थीक।