मिथिलाक्षर

मिथिलाक अपन लिपि थीक मिथिलाक्षर, जे 7म शतीमे सिद्धमातृका लिपिसँ निकलल आ अकर एखनि धरि प्राचीनतम उदाहरण 10 शतीक सहोदरा मंदिर अभिलेख, नरकटियागंज भेटल अछि। ओहि कालसँ 19म शतीक अंतधरि ई लिपि लगभग एके रूपमे सुरक्षित रहल। द आ भ अक्षरकें छोडि बाँकी सभटा एके रंगक अक्षर रहलैक। 20म शतीमे एकर अवनति आरम्भ भेल आ लगभग 1970क बाद एकर प्रयोग पूर्णतः विलुप्त भए गेल। आइ प्रसन्नताक विषय थीक जे एकरा फेरसँ प्रचलनमे अनबाक लेल प्रयत्न भए रहल अछि। एहि लिपिक मूल धारा कें सोझाँ अनबाक प्रयास एतए कएल गेल अछि।

मिथिलाक इतिहास


मिथिलाक इतिहास पर एखनहुँ धरि बहुत रास साक्ष्य माँटिमे गडल अछि वा मन्दिर सभ पर लागल धूरासँ लेपल अछि। प्रसन्नताक विषय थीक जे वर्तमानमे संचार-तकनीकक माध्यमसँ ओ साक्ष्यसभ लोकक सोझाँ आबि रहल अछि। विशेष रूपसँ पुरातात्त्विक सामग्री जेना मूर्ति, देबाल आदि सेहो जे.सी.बी. मशीनसँ ठाम-ठाम खुदाई होएबाक कारणें देखार भए रहल अछि। शिलालेख सँभ सेहो सोझाँ आबि रहल अछि। एतय एहने किछु सामग्रीक संकलन कएल गेल अछि जाहिसँ मिथिलाक इतिहासक ठोस नवीन साक्ष्य संकलित भए सकए।

मिथिलाक कर्मकाण्ड


मिथिला, बंगाल, आसाम उडीसा आ नेपाल ई समस्त पूर्वोत्तर प्रदेश कर्मकाण्डक परम्परामे लगभग एक समान रहल। एतय 7म शती धरि वैदिक परम्परा जीवित रहल मुदा एकर तुरते बाद बौद्ध महायान, शाक्त तन्त्र आ आगमक अन्य शाखाक बीच समन्वय स्थापित करैत एकटा धारा विकसित भेल। फलस्वरूप एतय पंचदेवोपासनाक प्रधानता रहल जकर मूल उद्देश्य सामाजिक समन्वय छल। एतय विशेषता ई रहलैक जे दुर्गोत्सव मे शाबरनृत्यक विधान धरि कएल गेल। तें मिथिलाक कर्मकाण्ड भारतक दोसर भागक कर्मकाण्डसँ पृथक् विशेषता रखने अछि

मिथिलाक संस्कृति


पूब, पश्चिम आ दक्षिणमे महानदीसँ तथा उत्तरमे हिमालय पर्वतसँ घेराएल मिथिलामे संस्कृतिक प्रवाह अदौकालसँ स्वतन्त्र रहल। एतए अपन संस्कृतिक प्रति लोकक आस्था एकरा संरक्षित करबामे सहायक सिद्ध भेल। तें हमरालोकनि देखैत छी जे एतय संस्कृतिमे परिवर्तन कमसँ कम भेलैक। इतिहासक साक्ष्यसभ कहैए जे समस्त पूर्वोत्तर भारतमे एहिठामसँ संस्कृतिक प्रसार भेल। एतए सलहेस, लोरिक, दीनाभद्री, कोइलावीर आदिक गाथा सुरक्षित रहल तँ दोसर दिस शाक्त, शैव, बौद्ध, वैष्णव, गाणपत्य आ सौर सभ परन्पराक उपासना पद्धति एक दोसरासँ तालमेल बैसबैत प्रवाहित होइत रहल

प्रकाशन


ब्राह्मी प्रकाशनक द्वारा संस्कृत, हिन्दी अंग्रेजी आ मैथिलीक पुस्तक सभक प्रकाशनमे तकनीकी सहायता सेहो देल जाइत अछि। आइ लेखक समस्या छनि जे अपन लिखल पुस्तक प्रकाशन योग्य कम्प्यूटर टाइपिंग कतए कराओल जाए? आइ कम्प्यूटरसँ प्रकाशनक युगमे मुद्रण कार्य सँ पूर्व ओकर टंकित प्रति बनाएब सभसँ महत्त्वपूर्ण काज भए गेल छैक। एहि कार्यमे सहयोग करब सोहो हमर एकटा उद्देश्य अछि। एखनि धरि अहि चारू भाषा मिलाकए 15 गोट पुस्तक प्रकाशित भए चुकल अछि

पोथी जे पढल


नव पोथी सभ जे पढबाक अवसर भेटैए, नीक लगैए, बेजाए लगैए, किछु कमी बुझाए तकरा सभकें एतए रखबाक प्रयास कएल गेल अछि। ई पोथी मैथिली, संस्कृत, हिन्दी, भोजपुरी, मगही अथवा अंग्रेजी कोनो भाषाक भए सकैत अछि।

मिथिलाक चित्रकला


मिथिलामे तान्त्रिक परम्पराक प्रभाव सभ क्षेत्रमे रहल। स्वाभाविक रूपसँ एकर चित्रकाला पर सेहो तन्त्रक प्रभाव पडल। प्रत्येक शुभ अवसर पर अलग अलग अरिपन, भित्तिचित्र, माँटिक मूर्ति आदि लिखबाक आ बनएबाक अपन विशेष शैली रहल। बाँस, सिक्की, खजूरक पात, ताड़क पात आदिसँ विभिन्न गृहपयोगी सामग्री सेहो विशिष्ट प्रकारें बनेबाक परम्परा रहल। हर्षक विषय अछि जे वर्तमानमे एकरा विकास आ प्रचार-प्रसारक लेल संस्थागत प्रयास सेहो भए रहल अछि…..Read more>>