A Missing Brahmanical Inscription on Dashavatar panel from Kesaria Stupa

पछवारि मिथिलामे अवस्थित केसरिया स्तूप एखनि बौद्ध पुरातात्त्विक केन्द्र मानल जाइत अछि, मुदा ओहिठाम सँ अतीतमे जे एकटा दशावतारक मूर्ति भेटल छल, ओहि पर शिलालेख सेहो छल, ताहि मूर्तिक कोनो उल्लेख बादमे नहिं भेटि रहल अछि।

Journal of the Asiatic Society of Bengal Vol IV 1835 मे प्रकाशित

एहि मूर्ति आ शिलालेखक प्रसंग जॉर्नल ऑफ द एसियाटिक सोसायटीक 1835 ई.क अंक मे एकटा विस्तृत विवरण छपल अछि। जे. बी. इलियट नामक पुराविद् कें ई मूर्ति एकटा फकीरसँ भेटल रहनि। एकर नीचाँमे एक पंक्तिक शिलालेख सेहो छल। ओ एहि मूर्तिक सम्बन्धमे एकटा टिप्पणी एहि जॉर्नल के सम्पादक कें लिखने रहथि। ओ टिप्पणी 1835 ई.क अंक मे पृष्ठ संख्या- 286 पर प्रकाशित अछि। एहि अंकक पृष्ठ संख्या 120 पर केसरिया स्तूपक एकटा चित्र सेहो प्रकाशित अछि, जे स्तूपक खुदाई होएबासँ पूर्वक थिक।

एतए ओ टिप्पणी अविकल प्रस्तुत अछि जाहिसँ ओहि क्षेत्रमे सनातन धर्मक गतिविधिक इतिहास लिखल जेबामे सुविधा होएत। मिथिलाक क्षेत्रसँ आरो आर एहन पूर्व प्रकाशित रिपोर्ट सभ भेटबाक सम्भावना अछि जकर उल्लेख कनिंघम के सर्वेक्षणक बाद नहिं भेल आ तें ओ पुरातात्त्विक सामग्री सभ इतिहास लेखनक लेल उपयोगमे नहिं आबि सकल।

VII. — Note on an Inscription found near the Kesariah Mound, in Tirhut.

By J. B. Elliott, Esq. (PL XVII. fig. 6.J

[In a note to the Editor.]

Having seen mention of the Kesariah Mound made in the last No. of your Journal, I beg to enclose the impression of an inscription cut below the figures of the Avatars, sculptured on a black stone, which I obtained at Kesariah several years ago from a fakir. The figures being small and rudely sculptured, it is not worth while making a copy of them; but as the inscription could not be made out by the Pandit of the Chaprah Committee, it may be worth deciphering. I visited and made some notes on the subject of the pillars, and other antiquities in Champaran, which I may, perhaps, hereafter communicate.

Note. — This fragment, which is Brahmanical, not Buddhist, is in an ancient form of Devanagari, differing little from that noticed on the  Bakra image of Mr. STEPHENSON. It breaks off abruptly with an initial i:— for it is only to Kirtiriha that any meaning can be traced: while the diphthong ai or e is plain over the last letter, which I conclude to be an h. The reading in modern Devanagari will be as follows : I have added a literal Latin version.

नित्यः श्री चन्द्रदत्तः सूर्य्यदत्तस्य सूक्ताश्रयादित्याह समुत्पन्नः कीर्तिरिहे

Perrpetuus B. CANDRADATTAS SURYADATTI “Sukti” –(recitandi) proprio-tempore-(sc)-soil-die-natus. Gloria hio….,

The interpretation of which in English will be: —

” The ever-living Chandradatta was born on the Sunday appropriated to the reading of the Sukta by his father Su’rtadatta. Glory here…….. ” (The Sukta is the most sacred hymn of the Rig Veda. closing its 3rd Ashtaka or Ogdoud — and has for one of its verses the celebrated Gayatri.)

W. H. M. [Note.— I take this opportunity of pointing out, in reference to my observation on the Bakra image inscription, (page 131,) that I had overlooked a plate in Franklin’s Paiibothra, of a Buddnist image, with an inscription, to which Lieut. Cunningham has since drawn my attention. On turning to it, I perceive, that the two lines separately given are, though miserably perverted by the copyist, precisely the same as the ye dharmmå hetun, &c. of Sarnãth. The three lines on the pedestal, though stated in the text to be different, would appear to be the same also; at least the two first words, ye dharmma, are distinct.–J. P.]

Journal of the Asiatic Society of Bengal Vol IV 1835

Photographically inverted image

यद्यपि एहि शिलालेखकें एतए पढि कए अनुवाद सेहो देल गेल अछि मुदा एकरा फेरसँ पढबाक आवश्यकता छैक। एतए मूर्तिलेखक जे रेखांकन देल गेल अछि ताहिसँ ई मिथिलाक्षरक आदिम रूप बुझाइत अछि। एहि मूर्तिलेखक पाठ हमरा जनैत एहि प्रकारें होएबाक चाही।

ॐ नित्यः (।)
श्रीचन्द्रदत्तः सूर्य्यदत्तस्य सूक्तश्रियादित्याभसमुत्पन्नः

अर्थात् ई शाश्वत थीक। श्रीसूर्यदत्तक द्वारा (जपल गेल) सूक्त (गायत्री)क तेजसँ सूर्य सनक आभा लए उत्पन्न जे चन्द्रदत्त, से एतए अपन कीर्ति एतए…..।

“नित्य” शब्द पुल्लिंगमे “शाश्वत” वाचक थीक- जेना गीतामे- “अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो” पाठ अछि। सूक्तश्रिया आदित्याभ-समुत्पन्नः एना पदच्छेद होएबाक चाही। भाव ई अछि जे पिता सूर्यदत्त जे आदित्यक सूक्त अर्थात् गायत्री मन्त्रक जप कएलनि तकर प्रभावसँ तेजवान् चन्द्रदत्तक जन्म भेल। ओ चन्द्रदत्त एतए अपन कीर्तिक रूपमे दशावतारक एकटा मूर्ति स्थापित कएल जकर ई मूर्तिलेख थीक।

जाहि आकृतिकें एतए “ह” पढ़ल गेल अछि ओ वस्तुतः मिथिलाक्षरक प्राचीन भ थीक, जेकर प्रयोग अंधराठाढीक तारा अभिलेख आ श्रीधरक अभिलेख दूनूमे भेल अछि।

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