कन्यादान

Ideal System of Marriage in Mithila, Part 1

लग्नक महत्त्व

मैथिलक विवाहमे शुभ समयक महत्त्व अदौसँ रहल अछि। वर कन्याक राशि आ नक्षत्रक आधार पर ज्योतिषी गुनि कए दिन तकैत छलाह आ संगहि ओहि दिन एक खास समयक निर्धारण सेहो करैत छलाह जे एहि कालमे कन्यादान होएत। जकरा महत्त्व दैत दूनू पक्षक दिस सँ पालन कएल जाइत छल।

जहियासँ सभाक आयोजन आरम्भ भेल तँ लग्न-शुद्धिक परिपालनमे व्यावहारिक असुविधा होमए लागल। कन्यागतक ओतए किनको ई बुझलो नै रहैत छलनि जे आइ हमरा ओतए कन्यादान होएत। सभामे विवाह तय भेल, साँझमे वर आ किछु बरियातीक संग कन्यागत अपना घर पर पहुँचलाह तखनि हुनका घरक लोक कें निश्चितता होइत छलनि जे आइए कन्यादान होएत। एहि स्थितिक वर्णन हरिमोहन झा कन्यादानमे कएने छथि। एहन स्थितिमे लग्नक परिपालन करब कठिन छल, तें केवल विवाहक दिनक परिपालन होमए लागल। आ केवल राति कें विवाह होएबाक परिपाटी आरम्भ भेल।

मुदा आब जखनि पहिनहिंसँ दिन तकाओल रहैत अछि तँ जहिना दिन तकबैत छी तहिना लग्नक सेहो विचार करबाक चाही। जँ पहिनहिंसँ सभटा निर्धारित रहत तँ व्यावहारिक असुविधाक समाधान सेहो कएल जा सकैत अछि।

20म शतीक एकटा घटना सुनल अछि जे एक विवाहमे बरियाती आ वरकें अएबामे विलम्ब भेलनि आ लग्न बीति गेल। मण्डप पर बैसल कन्यादाता घोषणा कएलनि जे आब हम कन्यादान नै करब। आइ विवाह नै होएत। कन्यादाता स्वयं ओहिकालक प्रसिद्ध विद्वान् रहथि तें हुनक एहि घोषणासँ खलबली मचि गेल। मण्डप पर हुनका दिससँ आरो विद्वान सभ रहथि। ओ सभ बुझएबाक प्रयास कएलनि, मुदा शास्त्रार्थ बजरि गेल। आनो लोकसभ तँ बुझिते रहथि जे ठीके लग्न तँ बीति गेल छैक, आ अगिला लग्न विवाहमे विहित नै अछि। तखनि बीचक रास्ता निकालल गेल आ किछु विद्वान् कहलथिन्ह जे लग्न बितलाक बाद कन्यादानसँ जे अशुभ होएबाक सम्भावना छैक तकर शान्तिक लेल हमसभ 10-10 हजार गायत्री-जपक फल एहि कन्याकें दैत छी। ओ लोकनि संकल्प लए ई फल दान कएलनि। ई व्यवस्था भेला पर कन्यादाता मानि गेलाह आ विवाह सम्पन्न भेल।

एकटा दोसर घटना हमर देखल अछि। प्राचीन कालक व्यवस्था छल जे कन्या तुला आ मिथुन एही तीन लग्नमे कन्यादान हो। एकटा विवाहमे नवीन व्यवस्था जाहिमे वृष, धनु आ मीन सेहो ग्राह्य छैक, ताहि अनुसार वृष लग्नमे कन्यादानक समय निर्धारित छल। कन्यागतक दिसक लोक जोर दैत रहथि जे एही मे कन्यादान भए जाए जाहिसँ हुनका बरियातीक स्वागतक लेल बेसी समय भेटनि। वर स्वयं ज्योतिषी रहथि। हुनक इच्छा जे मिथुन लग्नमे विवाह हो। मुदा ओ स्वयं बजताह केना? तखनि हम सभ जे बरियाती रही, तनिक माध्यम सँ कोनो प्रकारें दूनू पक्षक बीच समझौता कराए वृष लग्न बिताओल गेल।

आब अधिकांश मैथिलक विवाहमे लग्नक कोनो गणना नहि होइत अछि। विवाहक राति जखनि सुविधा हो तखनि कन्यादान कराए दियौक। एकर फल होइत अछि जे सभ क्षेत्रमे कन्यागत आ बराइत कें नव-नव फैशन शो करबाक लेल समय भेटि जाइत छनि आ फिजूलखर्ची बढि जाइत अछि। विवाहक विधि गौण आ खेल-टप्पा बेसी होइत अछि। ओ पूरा उपभोक्तावादक चंगुलमे फँसल जा रहल छथि। ई चिन्तनीय विषय थीक। एकरा खतम केने विना दहेजरहित विवाहक कल्पना कठिन अछि। तें हमरालोकनिकें एहि दिस जोर देबाक चाही जे विवाहक शुभ अवसर एकटा वैदिक संस्कार थीक। ओकर शुद्धता, समयक शुद्धता दिस हमरालेकनि कटिबद्ध होइ। जखने विवाहकें एकटा पवित्र संस्कार मानल जाए लागत तखनहिं बेसी लम्फ-लम्फाक दिससँ लोक विरत होएताह आ दहेज बहुत कम भए जाएत। कन्याक महत्त्व बढ़त, भौतिकवादक स्थान पर एकर आध्यात्मिक महत्त्वक मानसिकता जागत आ दहेजक दिससँ मोन टुटत।

लग्न-शुद्धिक सिद्धान्त

दिन-राति मिलाकए 12 टा राशिमे सूर्य रहैत छथि। ई बारह राशि बारह टा लग्न थीक। सूर्यक उदय एक मास धरि एक राशिमे होइत अछि ओएह राशि भेल सूर्योदयकालक लग्न ओतए सँ लग्नक गणना आरम्भ होइत अछि। उदाहरणक लेल मेष संक्रान्तिक बादसँ एक मास धरि अगिला संक्रान्ति धरि सूर्योदय काल में मेष संक्रान्ति रहत आ तकर बाद वृष, मिथुन कर्क ,सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन राशिमे सूर्यक अवस्थिति रहत। माने जे भरि वैशाख मेषमे सूर्योदय आ ओहिसँ छठम राशि पर सूर्य अस्त होएत। एहि प्रकारें भरि दिन-राति मे औसतन 2 घंटा 30 मिनट धरि एक लग्न रहत। ई काल स्थानक अक्षांशक आधार पर बदलैत अछि। मिथिलाक लेल एकर गणना हमरालोकनिकें डाकक वचन मे सेहो भेटैए।

प्राचीन परम्पराक अनुसार एहि बारह लग्नमे केवल तीन लग्न विवाहक लेल शुभ मानल गेल अछि- कन्या, तुला एवं मिथुन। नाह्निदत्त लिखैत छथि- कन्यातुलामिथुनगे लग्ने विवाहः शुभः। ई भेल उत्तम पक्ष। मध्यम पक्ष भेल जे बादमे तीन टा आरो लग्न कें जोड़ल गेलैक- वृष, धनु आ मीन।

एकर अर्थ भेल जे जँ अगहन मास विवाह होइत अछि तँ वृश्चिक राशि मे सूर्योदय होएत, मेष मे सूर्यास्त होएत आ तकर बाद बीचमे कर्क, आ सिंह लग्नमे विवाह अशुभ होएत। एहि गणनाकें बिसरि जेबाक परिणाम होइत अछि जे भरि रातिक लेल विवाहक समय मानि समयक कोनो प्रतिबन्ध नहिं रहलासँ फिजूलखर्ची बढ़ैत अछि। तें लग्नक शुद्धि सभ केओ अपनाबथि। अतीत मे जे सभक करैत छलाह से जँ बीचमे छोड़ि चुकल छी तँ ओकरा फेर सँ व्यवहारमे आनब नीक बात थीक